रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ईरान को खुला समर्थन देकर पश्चिमी देशों की नींद उड़ा दी है। ये सिर्फ दो देशों की मुलाकात नहीं थी। ये एक सीधा संदेश था। जब पुतिन कहते हैं कि रूस तेहरान के हितों के लिए हर मुमकिन कदम उठाएगा, तो उसका मतलब बहुत गहरा होता है। मिडिल ईस्ट में आग लगी है। इजरायल और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। ऐसे में पुतिन का खुलकर सामने आना वैश्विक राजनीति का रुख बदल सकता है।
रूस और ईरान का ये रिश्ता नया नहीं है। लेकिन हालिया महीनों में इसमें जो मजबूती आई है, वो चौंकाने वाली है। मास्को अब केवल ईरान का दोस्त नहीं रहा। वो उसका सबसे बड़ा रक्षक बनने की राह पर है। पश्चिमी पाबंदियों ने इन दोनों को एक-दूसरे के करीब धकेल दिया है। पुतिन जानते हैं कि ईरान को साथ रखकर वो अमेरिका की घेराबंदी कर सकते हैं। ये एक ऐसी साझेदारी है जिसमें दोनों को एक-दूसरे की सख्त जरूरत है।
पुतिन का ईरान प्रेम और रक्षा सौदों का सच
पुतिन ने साफ कर दिया है कि ईरान के साथ रूस के संबंध रणनीतिक प्राथमिकता हैं। ये केवल शब्दों तक सीमित नहीं है। रक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के बीच जो लेन-देन हो रहा है, वो इजरायल और अमेरिका के लिए बड़ा सिरदर्द है। ईरान ने रूस को यूक्रेन युद्ध में इस्तेमाल के लिए बड़ी संख्या में ड्रोन दिए। बदले में रूस क्या दे रहा है? जानकारों का मानना है कि रूस अपने घातक सुखोई-35 फाइटर जेट्स और S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम ईरान को देने की तैयारी में है।
ईरान की वायुसेना काफी पुरानी हो चुकी है। अगर उसे रूसी जेट्स मिल जाते हैं, तो उसकी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। ये इजरायल के लिए सीधा खतरा है। पुतिन का कहना है कि वे तेहरान की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। इसका मतलब है कि अगर ईरान पर हमला हुआ, तो रूस मूकदर्शक बनकर नहीं बैठेगा। ये बयानबाजी नहीं है। ये एक नई सैन्य धुरी का निर्माण है।
क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ने का खतरा
मिडिल ईस्ट में शक्ति का संतुलन हमेशा से नाजुक रहा है। पुतिन के इस खुले समर्थन ने उस संतुलन को हिलाकर रख दिया है। अरब देश भी इस घटनाक्रम को गौर से देख रहे हैं। रूस का ईरान के पक्ष में खड़ा होना ये बताता है कि पुतिन अब अमेरिका के प्रभाव वाले क्षेत्रों में घुसपैठ कर रहे हैं।
ईरान पर जब भी अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता है, वो रूस की तरफ देखता है। रूस उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो की ताकत से बचाता रहा है। अब पुतिन ने इसे एक कदम और आगे बढ़ा दिया है। उन्होंने ईरान के विकास और सुरक्षा को रूस के अपने हितों से जोड़ दिया है। ये इजरायल के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात है क्योंकि रूस और इजरायल के संबंध भी अब तक ठीक-ठाक रहे थे। पर अब रूस ने अपनी पसंद चुन ली है।
प्रतिबंधों की काट और आर्थिक मोर्चे पर एकजुटता
रूस और ईरान दोनों ही दुनिया के सबसे ज्यादा प्रतिबंधित देश हैं। अमेरिका ने इन पर इतने प्रतिबंध लगाए हैं कि इनका ग्लोबल बैंकिंग सिस्टम से नाता टूट चुका है। लेकिन यही पाबंदियां इनके मिलन का कारण बनीं। पुतिन और ईरानी नेतृत्व ने मिलकर अपना खुद का पेमेंट सिस्टम बनाने पर काम शुरू कर दिया है।
- व्यापार में उछाल: दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रहा है।
- ऊर्जा सहयोग: रूस ईरान के गैस और तेल बुनियादी ढांचे में निवेश कर रहा है।
- नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर: ये प्रोजेक्ट भारत, ईरान और रूस को जोड़ता है, जो स्वेज नहर का विकल्प बन सकता है।
ईरान को अब पश्चिमी देशों की परवाह कम हो गई है। उसे पता है कि उसके पीछे एक परमाणु शक्ति संपन्न देश खड़ा है। पुतिन की ये चाल अमेरिका के "मैक्सिमम प्रेशर" कैंपेन को फेल करने के लिए काफी है। जब दो ताकतवर और नाराज देश मिलते हैं, तो नतीजा हमेशा खतरनाक होता है।
इजरायल और अमेरिका की अगली चाल क्या होगी
अमेरिका के लिए ये स्थिति किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। जो बाइडन प्रशासन ने ईरान को रोकने की बहुत कोशिश की, पर पुतिन ने उस पर पानी फेर दिया। इजरायल अब रूस के साथ अपने संबंधों पर दोबारा विचार कर रहा है। उसे डर है कि रूस ईरान को ऐसी तकनीक दे सकता है जिससे ईरानी परमाणु कार्यक्रम को रोकना असंभव हो जाएगा।
पुतिन की रणनीति एकदम साफ है। वे यूक्रेन में उलझे होने के बावजूद दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि रूस अब भी एक ग्लोबल प्लेयर है। वे ईरान को एक मोहरे की तरह नहीं, बल्कि एक बराबर के साझीदार की तरह देख रहे हैं। इससे ईरान का आत्मविश्वास बढ़ा है। वो अब मिडिल ईस्ट में अपनी गतिविधियों को और तेज कर सकता है।
क्या ये तीसरे विश्व युद्ध की आहट है
क्रेमलिन से आई ये खबरें डराने वाली लग सकती हैं। कई लोग इसे एक बड़े युद्ध की शुरुआत मान रहे हैं। लेकिन हकीकत में ये एक नई "कोल्ड वॉर" है। रूस और ईरान का गठबंधन असल में पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए बना है। पुतिन जानते हैं कि ईरान को मजबूत करके वो अमेरिका को मिडिल ईस्ट में उलझाए रख सकते हैं। इससे यूक्रेन पर से पश्चिमी देशों का ध्यान हटेगा।
ये दोस्ती सिर्फ सैन्य नहीं बल्कि वैचारिक भी है। दोनों देश पश्चिमी उदारवाद और अमेरिकी दादागिरी के खिलाफ हैं। पुतिन ने बार-बार कहा है कि एक ध्रुवीय दुनिया का अंत हो चुका है। ईरान इस बहु-ध्रुवीय दुनिया का एक अहम हिस्सा है। रूस का समर्थन ईरान को वो वैधता देता है जिसकी उसे बरसों से तलाश थी।
ईरान के लिए रूस क्यों जरूरी है
ईरान के भीतर भी पुतिन को लेकर एक खास तरह का सम्मान बढ़ा है। ईरानी नेतृत्व को लगता है कि रूस अकेला ऐसा देश है जो अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर बात कर सकता है। ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है। उसे निवेश और तकनीक की जरूरत है। चीन के बाद रूस ही उसका सबसे बड़ा सहारा है।
रूस ईरान को अंतरिक्ष तकनीक और सैटेलाइट लॉन्च करने में भी मदद कर रहा है। ये जासूसी और निगरानी के मामले में ईरान की क्षमता बढ़ाएगा। जब पुतिन कहते हैं कि वे तेहरान के हितों के लिए कदम उठाएंगे, तो इसमें ये सभी तकनीकी सहयोग शामिल हैं। ये सहयोग ईरान को अपने दुश्मनों के मुकाबले कहीं बेहतर स्थिति में खड़ा कर देता है।
रूस और ईरान के इस गठबंधन को अब हल्के में नहीं लिया जा सकता। ये बदलते हुए ग्लोबल ऑर्डर की एक हकीकत है। आने वाले समय में आपको मिडिल ईस्ट में रूस की सक्रियता और बढ़ती हुई दिखेगी। अगर आप वैश्विक राजनीति और अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, तो इन दोनों देशों के रक्षा सौदों पर नजर बनाए रखें। ये खबरें सिर्फ अखबारों की सुर्खियां नहीं हैं, ये आपके और हमारे भविष्य को प्रभावित करने वाली घटनाएं हैं। इस बदलते घटनाक्रम पर अपनी राय स्पष्ट रखें और अपनी निवेश योजनाओं में भी वैश्विक अनिश्चितता को ध्यान में रखें।