पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत का लक्की मरवत इलाका एक बार फिर दहल गया है। शनिवार की दोपहर जब बाजार में लोग रोजमर्रा की खरीदारी में व्यस्त थे, तभी एक भीषण आईईडी (Improvised Explosive Device) धमाका हुआ। इस हमले में 9 लोगों की जान चली गई और 30 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हैं। यह कोई पहली घटना नहीं है। खैबर पख्तूनख्वा के सीमावर्ती इलाकों में पिछले कुछ महीनों से हिंसा का ग्राफ जिस तरह ऊपर गया है, वो डराने वाला है।
आम नागरिक अपनी जान गंवा रहे हैं। अस्पताल घायलों से भरे पड़े हैं। सुरक्षा एजेंसियां जांच का दावा कर रही हैं। लेकिन सच तो ये है कि पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। लक्की मरवत का यह बाजार धमाका सिर्फ एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है। यह उस विफल रणनीति का नतीजा है जिसने उग्रवादी समूहों को फलने-फूलने का मौका दिया। Meanwhile, you can find other developments here: The Optical Illusion of Putin on the Streets of Moscow.
लक्की मरवत धमाके की जमीनी हकीकत
धमाका इतना जोरदार था कि आसपास की दुकानें मलबे में तब्दील हो गईं। चश्मदीदों के मुताबिक, दोपहर का वक्त था और बाजार में काफी भीड़ थी। आईईडी को एक मोटरसाइकिल या शायद रेहड़ी में छिपाकर रखा गया था। धमाके के तुरंत बाद चीख-पुकार मच गई। स्थानीय लोग और बचाव दल मौके पर पहुंचे, लेकिन तब तक कई लोग दम तोड़ चुके थे।
घायलों को लक्की मरवत के जिला मुख्यालय अस्पताल और गंभीर रूप से जख्मी लोगों को बन्नू भेजा गया है। मरने वालों में स्थानीय व्यापारी और राहगीर शामिल हैं। पुलिस ने इलाके की घेराबंदी कर दी है। सर्च ऑपरेशन जारी है। पर क्या इससे कुछ बदलेगा? मुझे नहीं लगता। जब तक आतंकवाद की जड़ों पर प्रहार नहीं होता, ये घेराबंदी सिर्फ कागजी कार्रवाई बनकर रह जाती है। To understand the bigger picture, we recommend the recent analysis by Al Jazeera.
उग्रवाद का नया केंद्र बनता खैबर पख्तूनख्वा
खैबर पख्तूनख्वा (KP) में सुरक्षा की स्थिति अब काबू से बाहर होती दिख रही है। लक्की मरवत, डेरा इस्माइल खान और टैंक जैसे जिले उग्रवादियों के सॉफ्ट टारगेट बन गए हैं। टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) ने हाल के दिनों में अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। अफगानिस्तान में तालिबान के आने के बाद इन समूहों को एक नई ऊर्जा मिली है।
पाकिस्तान सरकार बार-बार दावा करती है कि वो आतंकवाद के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपना रही है। असलियत इसके ठीक उलट है। सेना और पुलिस के चौकियों पर हमले अब आम बात हो गई है। जब सुरक्षा बल खुद सुरक्षित नहीं हैं, तो आम आदमी की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? लक्की मरवत की घटना ये साबित करती है कि खुफिया तंत्र पूरी तरह नाकाम रहा है। बाजार जैसे सार्वजनिक स्थान पर आईईडी पहुंच जाना सुरक्षा में एक बहुत बड़ी चूक है।
क्यों बढ़ रहे हैं आईईडी हमले
आईईडी हमला करना आसान है। इसमें हमलावर को सामने आने की जरूरत नहीं पड़ती। रिमोट या टाइमर का इस्तेमाल करके कहीं से भी तबाही मचाई जा सकती है। पाकिस्तान के इन इलाकों में विस्फोटक सामग्री की उपलब्धता और स्थानीय नेटवर्क की मदद से उग्रवादी आसानी से अपने मंसूबों को अंजाम दे रहे हैं।
- खुफिया जानकारी का अभाव: स्थानीय स्तर पर सूचनाएं एकत्र करने में पुलिस नाकाम है।
- खुली सीमाएं: अफगानिस्तान के साथ लगती सीमा से घुसपैठ जारी है।
- स्थानीय समर्थन: डर या विचारधारा के कारण कुछ लोग इन उग्रवादियों को पनाह देते हैं।
राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा का संकट
पाकिस्तान इस वक्त दो मोर्चों पर लड़ रहा है। एक तरफ आर्थिक बदहाली है और दूसरी तरफ राजनीतिक खींचतान। जब देश का नेतृत्व आपस में लड़ने में व्यस्त हो, तो सुरक्षा एजेंसियां भी दिशाहीन हो जाती हैं। लक्की मरवत में जो हुआ, वो इसी राजनीतिक उदासीनता का परिणाम है।
इस्लामाबाद में बैठे हुक्मरान केवल निंदा प्रस्ताव जारी करते हैं। मुआवजे का ऐलान होता है। फिर सब भूल जाते हैं। अगले धमाके तक का इंतजार किया जाता है। जनता अब इस पैटर्न को समझ चुकी है। लोगों में गुस्सा है। विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। वे पूछ रहे हैं कि उनके टैक्स का पैसा अगर उनकी सुरक्षा नहीं कर सकता, तो जा कहां रहा है?
क्या पाकिस्तान अपनी गलतियों से सीखेगा
इतिहास गवाह है कि उग्रवाद को पालना हमेशा उल्टा पड़ता है। पाकिस्तान ने दशकों तक 'अच्छे' और 'बुरे' तालिबान का खेल खेला। आज वही आग उसके अपने घर को जला रही है। लक्की मरवत का धमाका उसी आग की एक लपट है। अगर अब भी सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो पूरा प्रांत गृहयुद्ध जैसी स्थिति में जा सकता है।
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सैन्य अभियान काफी नहीं हैं। आपको स्थानीय लोगों का विश्वास जीतना होगा। विकास कार्यों को गति देनी होगी। युवाओं को रोजगार देना होगा ताकि वे उग्रवाद की राह न पकड़ें। लेकिन क्या पाकिस्तान के पास इसके लिए संसाधन हैं? फिलहाल तो नहीं दिखते।
अब आगे क्या करना जरूरी है
सिर्फ निंदा करने से काम नहीं चलेगा। कुछ ठोस कदम उठाने होंगे जो जमीन पर असर दिखाएं।
- खुफिया नेटवर्क का आधुनिकीकरण: पारंपरिक तरीकों को छोड़कर तकनीक का सहारा लेना होगा।
- सीमा प्रबंधन: डूरंड लाइन पर निगरानी को और सख्त करना होगा।
- पुलिस का सशक्तिकरण: स्थानीय पुलिस को सेना के भरोसे छोड़ने के बजाय उन्हें आधुनिक हथियारों और ट्रेनिंग से लैस करना होगा।
- आतंकियों के वित्त पोषण पर रोक: उन रास्तों को बंद करना होगा जहां से इन समूहों को पैसा मिलता है।
लक्की मरवत के बाजार में फैली खून की होली को रोकना है तो पाकिस्तान को अपनी दोहरी नीति छोड़नी होगी। आतंकवाद चाहे किसी भी रूप में हो, वो सिर्फ तबाही लाता है। आज 9 परिवारों ने अपनों को खोया है। कल ये संख्या बढ़ सकती है। समय हाथ से निकलता जा रहा है। सरकार को अब शब्दों से ज्यादा एक्शन पर ध्यान देने की जरूरत है। अगर अब भी आंखें नहीं खुलीं, तो बहुत देर हो जाएगी।
बाजारों में सुरक्षा बढ़ाने के लिए सीसीटीवी कैमरों का जाल बिछाना और मेटल डिटेक्टरों का सही इस्तेमाल करना एक शुरुआती कदम हो सकता है। स्थानीय व्यापारियों को भी सुरक्षा प्रोटोकॉल के प्रति जागरूक करना होगा। संदिग्ध गतिविधियों की रिपोर्ट करने के लिए एक सुरक्षित हेल्पलाइन बनाना भी मददगार साबित हो सकता है। जनता का सहयोग ही इस जंग को जीतने का एकमात्र तरीका है।